यूँ तो जाते हुए मैंने उसे रोका भी नहीं,
प्यार उस से न रहा हो मुझे ऐसा भी नहीं ।
मुझको मंज़िल की कोई फ़िक्र नहीं है या रब,
पर भटकता ही रहूँ जिस पे वो रस्ता भी नहीं ।
मुन्तज़िर मैं भी किसी शाम नहीं था उसका,
और वादे पे कभी शख़्स वो आया भी नहीं ।
जिसकी आहट पे निकल पड़ता था कल सीने से,
देख कर आज उसे दिल मेरा धड़का भी नहीं ।
Farhat Shahzad. Jagjit Singh.
Jawab Jinka Nahi Wo Sawaal Hote Hain Jo Dekhne Mein.
जवाब जिनका नहीं वो सवाल होते हैं,
जो देखने में नहीं कुछ कमाल होते हैं ।
तराश्ता हूँ तुझे जिनमें अपने लफ़्ज़ों से,
बहुत हसीन मेरे वो ख़्याल होते हैं ।
हसीन होती है जितनी बला की दो आँखें,
उसी बला के उन आँखों में जाल होते हैं ।
वो गुनगुनाते हुए यूँ ही जो उठाते हैं,
क़दम कहाँ वो क़यामत की चाल होते हैं ।
जो देखने में नहीं कुछ कमाल होते हैं ।
तराश्ता हूँ तुझे जिनमें अपने लफ़्ज़ों से,
बहुत हसीन मेरे वो ख़्याल होते हैं ।
हसीन होती है जितनी बला की दो आँखें,
उसी बला के उन आँखों में जाल होते हैं ।
वो गुनगुनाते हुए यूँ ही जो उठाते हैं,
क़दम कहाँ वो क़यामत की चाल होते हैं ।
Farhat Shahzad. Jagjit Singh.
Benaam Sa Ye Dard Thehar Kyun Nahi Jaata Jo Beet.
बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता ।
सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता ।
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता ।
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता ।
वो नाम जो बरसो से ना चेहरा ना बदन है,
वो ख़्वाब अगर है तो बिखर क्यूँ नहीं जाता ।
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता ।
सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता ।
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता ।
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता ।
वो नाम जो बरसो से ना चेहरा ना बदन है,
वो ख़्वाब अगर है तो बिखर क्यूँ नहीं जाता ।
Nida Fazli. Jagjit Singh.
Teri Aankhon Se Hi Jaage Soye Hum Kab Tak Aakhir.
तेरी आँखों से ही जागे सोयें हम,
कब तक आख़िर तेरे ग़म में रोयें हम ।
वक़्त का मरहम ज़ख़्मों को भर देता है,
शीशे को भी ये पत्थर कर देता है,
रात में तुझको पायें दिन में खोयें हम ।
हर आहट पर लगता है तू आया है,
धूप है मेरे पीछे आगे साया है,
खुद अपनी ही लाश को कब तक ढोयें हम ।
कब तक आख़िर तेरे ग़म में रोयें हम ।
वक़्त का मरहम ज़ख़्मों को भर देता है,
शीशे को भी ये पत्थर कर देता है,
रात में तुझको पायें दिन में खोयें हम ।
हर आहट पर लगता है तू आया है,
धूप है मेरे पीछे आगे साया है,
खुद अपनी ही लाश को कब तक ढोयें हम ।
Nida Fazli. Jagjit Singh.
Har Ek Ghar Mein Diya Bhi Jale Anaaj Bhi Ho Agar Na Ho.
हर एक घर में दीया भी जले अनाज भी हो,
अगर ना हो कहीं ऐसा तो एहितयाज भी हो ।
हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं,
हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो ।
रहेगी कब तलक़ वादों में कै़द खुशहाली,
हर एक बार ही कल क्यूँ कभी आज भी हो ।
ना करते शोर शराबा तो और क्या करते,
तुम्हारे शहर में कुछ और कामकाज भी हो ।
अगर ना हो कहीं ऐसा तो एहितयाज भी हो ।
हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं,
हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो ।
रहेगी कब तलक़ वादों में कै़द खुशहाली,
हर एक बार ही कल क्यूँ कभी आज भी हो ।
ना करते शोर शराबा तो और क्या करते,
तुम्हारे शहर में कुछ और कामकाज भी हो ।
Nida Fazli.Jagjit Singh.
Gulshan Ki Faqat Pholon Se Nahi Kanton Se Bhi Zenatein.
गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काटों से भी ज़ीनत होती है,
जीने के लिये इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है ।
ऐ वाइज़-ए-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती है यहाँ रोज़ क़यामत होती है ।
वो पुरसिश-ए-ग़म को आये हैं कुछ ना सकूँ चुप रह ना सकूँ,
ख़ामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूँ तो शिकायत होती है ।
करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आसूँ,
फरीयाद-ओ-फ़ुगाँ से ऐ नादाँ तोहीन-ए-मोहब्बत होती है ।
जो आ के रूके दामन पे ‘सबा’ वो अश्क़ नहीं है पानी है,
जो अश्क़ ना छलके आँखो से उस अश्क़ की क़ीमत होती है ।
जीने के लिये इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है ।
ऐ वाइज़-ए-नादान करता है तू एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती है यहाँ रोज़ क़यामत होती है ।
वो पुरसिश-ए-ग़म को आये हैं कुछ ना सकूँ चुप रह ना सकूँ,
ख़ामोश रहूँ तो मुश्किल है कह दूँ तो शिकायत होती है ।
करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आसूँ,
फरीयाद-ओ-फ़ुगाँ से ऐ नादाँ तोहीन-ए-मोहब्बत होती है ।
जो आ के रूके दामन पे ‘सबा’ वो अश्क़ नहीं है पानी है,
जो अश्क़ ना छलके आँखो से उस अश्क़ की क़ीमत होती है ।
Saba Afghani. Jagjit Singh.
Jab Naam Tera Pyaar Se Likhti Hai Ungliyan Meri Taraf.
जब नाम तेरा प्यार से लिखती हैं उँगलियां,
मेरी तरफ ज़माने कि उठती हैं उँगलियां ।
दामन सनम का हाथ में आया था एक पल,
दिन रात उस ही पल से महकती हैं उँगलियां ।
जिस दिन से दूर हो गये हो उस दिन ही सनम,
बस दिन तुम्हारे आने के गिनती हैं उँगलियां ।
पत्थर तराश कर ना बना ताज एक नया,
फनकार के ज़माने में कटती हैं उँगलियां ।
मेरी तरफ ज़माने कि उठती हैं उँगलियां ।
दामन सनम का हाथ में आया था एक पल,
दिन रात उस ही पल से महकती हैं उँगलियां ।
जिस दिन से दूर हो गये हो उस दिन ही सनम,
बस दिन तुम्हारे आने के गिनती हैं उँगलियां ।
पत्थर तराश कर ना बना ताज एक नया,
फनकार के ज़माने में कटती हैं उँगलियां ।
Madanpal. Chitra Singh.
Kanton Ki Chuban Payii Pholon Ka Mazaa Bhi Barsaat Ke.
काँटों की चुभन पायी, फूलों का मज़ा भी,
दिल दर्द के मौसम में, रोया भी हँसा भी ।
आने का सबब याद न जाने की ख़बर है,
वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी ।
हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है,
गुमराह मेरे साथ हुआ राहनुमा भी ।
‘गुमनाम’ कभी अपनो से जो ग़म हुए हासिल,
कुछ याद रहे उनमें तो कुछ भूल गये भी ।
दिल दर्द के मौसम में, रोया भी हँसा भी ।
आने का सबब याद न जाने की ख़बर है,
वो दिल में रहा और उसे तोड़ गया भी ।
हर एक से मंज़िल का पता पूछ रहा है,
गुमराह मेरे साथ हुआ राहनुमा भी ।
‘गुमनाम’ कभी अपनो से जो ग़म हुए हासिल,
कुछ याद रहे उनमें तो कुछ भूल गये भी ।
Surender Malik 'Gumnam'.Chitra Singh.
शम्म-ए-मज़ार थी ना कोई सोगवार था,
तुम जिस पे रो रहे थे वो किसका मज़ार था ।
तड़पूँगा उम्र भर दिल-ए-मर्हुम के लिये,
कम्बख़्त नामुराद लड़कपन का यार था ।
जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़ुबान में,
तुम झूठ कह रहे थे मुझे ऐतबार था ।
क्या क्या हमारे सज़दे की रूसवाईयाँ हुई,
नक़्श-ए-क़दम किसी का सरे रह-गुज़ार था ।
तुम जिस पे रो रहे थे वो किसका मज़ार था ।
तड़पूँगा उम्र भर दिल-ए-मर्हुम के लिये,
कम्बख़्त नामुराद लड़कपन का यार था ।
जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़ुबान में,
तुम झूठ कह रहे थे मुझे ऐतबार था ।
क्या क्या हमारे सज़दे की रूसवाईयाँ हुई,
नक़्श-ए-क़दम किसी का सरे रह-गुज़ार था ।
Bekhud Dehlvi. Jagjit Singh.
उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े,
अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े ।
हर शाम ये सवाल मोहब्बत से क्या मिला,
हर शाम ये जवाब के हर शाम रो पड़े ।
राह-ए-वफ़ा में हमको खुशी की तलाश थी,
दो गाम ही चले थे के हर गाम रो पड़े ।
रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला,
अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े ।
अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े ।
हर शाम ये सवाल मोहब्बत से क्या मिला,
हर शाम ये जवाब के हर शाम रो पड़े ।
राह-ए-वफ़ा में हमको खुशी की तलाश थी,
दो गाम ही चले थे के हर गाम रो पड़े ।
रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला,
अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े ।
Sudarshan Faakir. Jagjit Singh.
ये पीने पीलाने के सब हैं बहाने ।
वो दामन हो उनका के सुनसान सहरा,
बस हमको तो आख़िर हैं आँसू बहाने ।
ये किसने मुझे मस्त नज़रों से देखा,
लगे खुद-ब-खुद ही क़दम लड़-खड़ाने ।
चलो तुम भी ‘गुमनाम’ अब मयकदे में,
तुम्हें दफ़्न करने हैं कई ग़म पुराने ।
वो दामन हो उनका के सुनसान सहरा,
बस हमको तो आख़िर हैं आँसू बहाने ।
ये किसने मुझे मस्त नज़रों से देखा,
लगे खुद-ब-खुद ही क़दम लड़-खड़ाने ।
चलो तुम भी ‘गुमनाम’ अब मयकदे में,
तुम्हें दफ़्न करने हैं कई ग़म पुराने ।
Surender Malik 'Gumnam'.Jagjit Singh.
बात साक़ी की न टाली जाएगी,
कर के तौबा तोड़ ड़ाली जाएगी ।
देख लेना वो न खाली जाएगी,
आह जो दिल से निकाली जाएगी ।
गर यही तर्ज़े-ए-फ़ुगाँ है अन्दलीब,
तो भी गुलशन से निकाली जाएगी ।
आते आते आएगा उनको ख़याल,
जाते जाते बेख़याली जाएगी ।
क्यूँ नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़,
ईद क्या अब के भी खाली जाएगी ।
कर के तौबा तोड़ ड़ाली जाएगी ।
देख लेना वो न खाली जाएगी,
आह जो दिल से निकाली जाएगी ।
गर यही तर्ज़े-ए-फ़ुगाँ है अन्दलीब,
तो भी गुलशन से निकाली जाएगी ।
आते आते आएगा उनको ख़याल,
जाते जाते बेख़याली जाएगी ।
क्यूँ नहीं मिलती गले से तेग़-ए-नाज़,
ईद क्या अब के भी खाली जाएगी ।
Habib Jaleel.Jagjit Singh.
यूँ तो गुज़र रहा है हर एक पल खुशी के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
रिश्ते वफ़ायें दोस्ती सब कुछ तो पास है,
क्या बात है पता नहीं दिल क्यूँ उदास है,
हर लम्हा है हसीन नई दिल कशी के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
चाहत भी है सुकुन भी है दिलबरी भी है,
आँखों में ख़्वाब भी है लबों पर हँसी भी है,
दिल को नहीं है कोई शिकायत किसी के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
सोचा था जैसा वैसा ही जीवन तो है मगर,
अब और किस तलाश में बेचैन हैं नज़र,
कुदरत तो मेहरबान है दरियादिली के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
रिश्ते वफ़ायें दोस्ती सब कुछ तो पास है,
क्या बात है पता नहीं दिल क्यूँ उदास है,
हर लम्हा है हसीन नई दिल कशी के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
चाहत भी है सुकुन भी है दिलबरी भी है,
आँखों में ख़्वाब भी है लबों पर हँसी भी है,
दिल को नहीं है कोई शिकायत किसी के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
सोचा था जैसा वैसा ही जीवन तो है मगर,
अब और किस तलाश में बेचैन हैं नज़र,
कुदरत तो मेहरबान है दरियादिली के साथ,
फिर भी कोई कमी सी है क्यूँ ज़िन्दगी के साथ ।
Nida Fazli.Jagjit Singh.
Ab Ke Baras Bhi Woh Nahiin Aaye Bahar Mein Guzarega.
अबके बरस भी वो नहीं आये बहार में,
गुज़रेगा और एक बरस इन्तज़ार में ।
ये आग इश्क़ की है बुझाने से क्या बुझे,
दिल तेरे बस में है ना मेरे इख़्तियार में ।
है टूटे दिल में तेरी मोहब्बत तेरा ख़याल,
खुश-रंग है बहार जो गुज़री बहार में ।
आँसू नहीं है आँखों में लेकिन तेरे बग़ैर,
तूफान छुपे हुए हैं दिल-ए-बेक़रार में ।
गुज़रेगा और एक बरस इन्तज़ार में ।
ये आग इश्क़ की है बुझाने से क्या बुझे,
दिल तेरे बस में है ना मेरे इख़्तियार में ।
है टूटे दिल में तेरी मोहब्बत तेरा ख़याल,
खुश-रंग है बहार जो गुज़री बहार में ।
आँसू नहीं है आँखों में लेकिन तेरे बग़ैर,
तूफान छुपे हुए हैं दिल-ए-बेक़रार में ।
Payaam Saeedi. Chitra Singh.
मेरे क़रीब ना आओ के मैं शराबी हूँ,
मेरा शऊफ़ जगाओ के मैं शराबी हूँ ।
ज़माने भर की निगाहों से गिर चुका हूँ मैं,
नज़र से तुम ना गिराओ के मैं शराबी हूँ ।
ये अर्ज़ करता हूँ गिर के ख़ुलुस वालो से,
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ ।
तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आँखों में,
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ ।
मेरा शऊफ़ जगाओ के मैं शराबी हूँ ।
ज़माने भर की निगाहों से गिर चुका हूँ मैं,
नज़र से तुम ना गिराओ के मैं शराबी हूँ ।
ये अर्ज़ करता हूँ गिर के ख़ुलुस वालो से,
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ ।
तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आँखों में,
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ ।
Saba Sikri. Jagjit Singh.

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